शनिवार, 1 जनवरी 2011

लघु-कथा: पुत्र मोह


 गौरव और  नंदनी घर छोड़  कर पुणे जा रहे हैं ,ये बात जंगल की आग की तरहपूरे मुह्ह्ले में फैल चुकी थी ये पाण्डेजी के घर की बात होरही है  जो पूरे देवनगर के सबसे प्रतिष्ठित घराना मानाजाता है .सबलोगों को बड़ा  आश्चर्य हो रहा था क्योंकि सबने मान लिया था की सौरव के जाने के बाद गौरव तो यहीं रहने वाला है अपने माँ पापा के पास  अपने खानदानी बिजनेस को चलाने क्योंकि उनका बिजनेस भी तो बहुत बड़ा है जेवरातों का . सौरव को तो बिजनेस पसंद ही नहीं था सो वो तो नौकरी के लिए पहले ही जा चूका था  .जिसे देखो वो इसी बात की  चर्चा कर रहा था  पर किसी को ठीक से कुछ मालूम नहीं था कुछ गिने चुने गौरव के दोस्तों को छोड़ कर . आखिर ये लोग क्यों घर से जा रहे हैं ?ऐसा क्या हो गया की घर से जाने  की नौबत आगई .अंत में मुह्ह्ले की  कुछ महिलाएं उनके  घर जाने की ठानी. जो भी पता चलेगा  वहीँ  से चलेगा .पर वहां जाने पर श्रीमति पाण्डे  को देखकर किसी की कुछ भी पूछने की हिम्मत नहीं हुई.सबलोग चुपचाप बैठ गए जयाने कोशिश की थी सरला से बात करने की पर वो तो हाँ हूँ भी नहीं कर रही थी .थोड़ीदेर में अन्दर से  नंदनी को आते देख  शीला ने पूछ ही लिया,"  बहू ये क्या सुन रहें हैं हमलोग, क्यों और कहाँ जा रहे हो तुमलोग?" जया ने भी  कहा" ये मालती जी को क्या हो गया इस तरह क्यों बैठी हैं ?कुछ बोलती नहीं है?कोई बात हो गया है क्या जो परेशान दिखती हैं बहुत?"
नंदनी  सभी को प्रणाम कर के  बोली" चाचीजी इनकी एक अच्छी कंपनी में नौकरी लगी है सो हमारी पुणे जाने की बात से मम्मीजी बहुत परेशान हैं." " .अरे- ये गौरव भी नौकरी करने वाला है हमें तो इसका अंदाजा ही नहीं था?" ये प्रतिक्रिया सब के बीच से आयी" यों अचानक किसीको को बताये बगैरही तुम लोग जा रहे हो?" मीना ने पूछा तो नंदू बोली " नहीं चाचीजी इनका तो पहले से ही जाने का प्रोग्राम था मेरा पहले पक्का नहीं था .स्कूल में सोना का  नाम लिखा गया है सो जाने का अभी  बाद में तै हुआ है दरअसल बीच के  सेसन  में नाम लिखाना थोडा मुश्किल था हमलोगों को ही विश्वाश नहीं था  पर सब ठीक से हो गया एक दो दिन पहले ही मालुम हुआ इसी से  किसी को नहीं पता था ." पर तुम्हारी सास को तो सब पता होगा फिर ये  ऐसे क्यों कर रही हैं?" " जी सोना से कभी अलग नहीं रही न सो दुःख तो होगा ही फिर हम तीनो के जाने के बाद कैसे रह पाएंगी ? इसीलिए मै तो जाना ही नहीं चाहती थी पर सोना को कुछ दिनों में स्कूल जाना है तो गौरव  चाहते हैं मै जाऊं .अच्छा  मैं चाय भेजती हूँ. " कहकर नंदनी वहां से रसोई की तरफ चली गयी सारी औरतों ने चाहा मालतीजी कुछ बात करें पर वो तो जैसे वहां थीं ही नहीं कुछ देर में चाय आगया .नंदनी भी आयी कुछ देर बैठी भी पर कुछ ही देर बाद बोली " मै पापाजी को खाना  देने जा रही हूँ टाइम हो गया है" ये  कह कर  वो चली गयी .
सोना अपने मीठी बातों से सब का मन बहला रही थी पर इनके दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था सो  बच्ची से  कुछ  खास  बात नहीं कर पायीं .    .
        थक हारकर सब ने सोचा कोई फायदा नहीं होगा रुक कर सो चला जाये .पर जाते जाते  रेखा ने महरी को बुलाया ऊससे भी कुछ पूछने से  पता नहीं लगा तब  निराश होकर सब जाने लगीं .तभी एक ने सुझाव दिया" क्यों न श्रीमति वर्मा के यहाँ चले वो तो बिलकुल पास हैं बल्कि सटा हुआ घर है उनका  जरुर उन्हें पता होगा .सब सहमत हो गयी और चल पड़ी .श्रीमति वर्मा यानि की मैं ,ये सच है पाण्डे जी का घर क्या परिवार भी मुझसे बहुत करीब है मुझे गौरव की जाब का भी पता था बल्कि मै तो मिठाई भी खा चुकी थी असल में पढ़ाई में गौरव शुरू से बहुत अच्छा था इंजिनयरिंग  करने के बाद ही उसे ऑफर आने लगे थे और ये तो उसका मन चाहा जाब था बिजनेस वो करना ही नहीं  चाहता था पर सौरव के जाने के बाद उसे डर था की घर वाले नहीं मानेंगे  इस बात के लिए पर अब  पापा भी मान गए थे मालती भी थोडा नानुकुर करके मान गयी .ये सब तो मै जानती थी .पर सच कहूँ तो अब  से थोड़ी देर पहले तक  मै भी कुछ  ज्यादा  नहीं जानती थी .मै तो ऊपर बालकनी में  धुप में बैठ कर कुछ देर लिखना चाह रही थी .सुखिया को तेल लाने कहा था अपने गठिया से सूजे  पैरों की मालिश करने . आते ही  सुखिया  ने अपनी बातों का पिटारा खोला .वह कभी मुहं बंद रखकर भी कोई काम  कर सकती है भला ? शुरू हो गयी अपने किस्से ले कर मुझे भी तो उसकी बातों  में रस मिलता  है  बल्कि कभी कभी उन्ही किस्सों में मेरे कहानी के पात्र भी मिल जाते हैं .
              उसीसे अभी अभी सारी बातों का पता चला  है ".दीदी आपको पता है कल बगलवाले कोठी यानि  गौरव भैया के घर में  क्या हुआ?" " नहीं तो क्या हुआ तू ही बता दे" मै मुस्कुरा कर बोली  "नंदनी भाभी माँ बनने वालीं हैं." " क्या?" मैं ख़ुशी से बोल पड़ी" आप पूरी बात तो सुनिए पहले , रात जब मैं पानी पीने  उठी तो जोरजोर से बड़ी मालकिन के  बोलने की आवाजें आरही थी  गौरव भैया की माँ बहुत गुस्से में बोलरही थी  " मैं कुछ नहीं सुनूगी बिना बेटा हुये बंश चलता है पूर्वजों का तर्पण कौन करेगा ?  यही समाज का नियम है ,इस कुल का  कोई तो एक होना चाहिए . मै कोई समाज से अलग  नहीं हूँ और क्या गलत  बोल रही हूँ. तुम लोग दो से ज्यादा बच्चा नहीं चाहते हो तो बेटा के लिए दोबारा क्यों नहीं कोशिश कर सकते हो ?गौरव चिढ़ गया " माँ आप क्यों नहीं समझती हैं डाक्टर ने साफ मना कर दिया है नंदनी के जान को खतरा है  .अगर खतरा न भी होता तब भी हम ये सब  नहीं करते . वैसे भी बेटा या बेटी में कोई फर्क नहीं है हमारी नजरों में  .कान खोल कर सुन लीजिये  कभी भी हम ऐसा कदम नहीं उठाएंगे . मालती भी कुछ सुनने को नहीं तैयार."  तू अच्छीतरह से जानता  है माला { बड़ी बहू } और सौरव ने   उस समय आपरेशन  करा कर जो किया उसके बाद मेरी उम्मीद की ये आख़री किरण बची है तू उसे भी तोड़ रहा है मै कुछ नहीं जानती किसी दुसरे डाक्टर से बात कर . वरना मै खुद बात करुँगी . "क्या !गौरव कुछ पल के लिए अवाक रह गया .फिर नंदनी की और मुड कर  कहा "  नंदू तुम भी मेरे साथ चल रही हो सामान पैक करो अपना .गौरव गुस्से 
से कांप रहा था  ".तुम माँ हो की दुश्मन ? मै नंदनी को यहाँ अब एकपल भी नहीं छोड़ सकता हूँ पता नहीं तुम क्या अनर्थ कर बैठो .  इतने में भैया के पापा आये बोले  "बेटा तू जो कर रहा बिलकुल ठीक कर रहा है पता नहीं इसे कब अकल आएगी .पोते की चाह में बेटे से भी दूर होगी तब शायद समझे तू अपना परिवार लेकर पुणे जा .अब अकेले ही रह कर इसकी आँखे खुलेगी .
   "  इसके बाद दीदी पता नहीं माँ जी ने क्या कहा या किया मै जान नहीं पाई पर कुछ तो हुआ जो नंदनी भाभी के रोने की आवाज आ रही थी .
     " अच्छा सुखिया बहुत हुआ किसी के निजी जिन्दगी में ज्यादा ताकझांक ठीक नहीं है .तुने मुझे जो बताया सो बताया अब किसी औरसे  कुछ भी नहीं कहना .इतने में नीचे से आवाज आयी कहाँ हैं सरला दी ? मैं नीचे जाने के पहले एक बार फिर से चेताया सुखिया मेरी बात याद रखना किसी को पता  न चले गौरव भैया के घर की बात  ".समझ गयी दीदी नहीं पता चलेगी .
      ".आज सभी को एक साथ मेरी सुध कैसे आगई ? राधा बोली " आपने तो आना बंद ही कर दिया  आज बड़ा मन हो रहा था सभी का आप  से मिलने का तो सब ने मिल कर आने का प्रोग्राम बना डाला . जया ने हंस कर कहा " क्यों हमने आकर आपको डिस्टर्ब तो नहीं किया क्या "?अरे नहीं मै तो अब पैर से लाचार होगईहूँ जल्दी कहीं आजा नहीं सकती .अब आपलोगों के आने से मेरा मन भी बहल गया नहीं तो अकेले किसी तरह टाइम बिताती हूँ .कहिये क्या हो रहा है आजकल  आपके महिला क्लब में ? " आपके नहीं आने से अब  पहले वाली रौनक  नहीं रही . "क्या करूँ अब चलने में तकलीफ होने लगा है मन तो बड़ा होता है आने का  मैंने कहा पर मज़बूरी है . "दीदी आप सुनाइए क्या लिख रही हैं कहानी या उपन्यास रूचि ने पूछा, उसे पढने का बड़ा शौक है "  एक कहानी पर काम कर रही हूँ आजकल .मैंने बताया . "अच्छा दीदी आपको लिखने के लिए आईडिया कहाँ से मिलता है ? अबकी ममता ने मुंह खोला. " सब आपलोगों की ही दुआ है  ".यानि?" यानि आप के  आसपास से ही कुछ मिलता है जिसे मै अपनी कल्पना का जामा  पहना कर पेश करती हूँ .आपको पसंद आया अगर, तो मेरी मेहनत सफल हो जाती है वरना मेरी बदकिस्मती . " अरे नहीं दीदी भला आपका लिखा कभी पसंद न आये  किसीको ऐसा  हो सकता है भला ?शीलाने  मस्का लगाया " अच्छा बताईये आपलोग क्या लेंगे चाय या काफी? " अरे अभी अभी तो चाय पी है पाण्डे जी के घर .ये बोलने के बाद थोडा झेंप गयी मीना  मैंने गहरी नजरों से उसे देखा. " चलो तब  काफी पीते हैं . सुखिया से मैंने सब के लिए काफी लाने को कहा .साथ में कुछ खाने के लिए गरमा गर्म  पकौड़ियाँ भी  ".जी अच्छा दीदी  , भेद भरी नजरों से मुझे देखती हुई सुखिया बोली .मै उसकी नजरों को अच्छी तरह समझ रही थी ये सब हमसे पाण्डे जी के घर का भेद जानने आयी हैं ये बताना चाहती थी वो .मैंने भी नजरों से  उसे आश्वस्त किया कुछ  जान नहीं  पाएंगी  तू जा .सुखिया मेरी विश्वासी है 
          कुछ देर तक ढेर सारी इधरउधर की बातें हुईं फिर पकौड़ों का लुफ्त उठाया गया.  काफी का मग हाँथ में आतेही सब  जो बहुत देर से अपने को रोक कर रक्खी थीं  फूट पड़ीं  सबसे पहले मीना ने ही कहा  " दीदी आपके पड़ोस में क्या चल रहा है? " क्या चल रहा है भाई, मैं बोली ?" आपको तो जरुर मालुम होगा.?" .देखो तुम क्या बोल  रही हो मै नहीं जानती साफ साफ बोलो तो कुछ समझ पाऊँगी ." दीदी पाण्डे जी के घर में कुछ तो ऐसा हुआ है जो अचानक गौरव अपने परिवार को ले कर पुणे जा रहा है मालती जी भी सदमे में हैं  ?आपको जरुर पता होगा बताईये न ?
" ऐसा तो कुछ नहीं है जो न समझ आये ये तो ख़ुशी की बात है की गौरव को बहुत ही अच्छी नौकरी मिली है पर घर के आधे से ज्यादा लोग जारहें हैं तो मालती का  दुखी होना लाजमी है पर अपने बेटी के भविष्य के लिए और अपने लिए  गौरव अपने साथ परिवार ले जा रहा है तो इसमें क्या गलत है?आपलोग खांमखा इस बात को ले कर चिंतित हो रहीं हैं.मेरे इस टेक से जवाब के बाद  फिर किसी ने ये बात दुबारा नहीं की  .धीरे धीरे सब ने फुसफुसा कर तै किया यहाँ से कुछ मालूम नहीं होने वाला है सो बेकार में टाइम बर्बाद करने से कोई फायेदा नहीं है कुछ देर इधर उधर की बातें करने के बाद सुधा बोली  अब चला जाये ." अच्छा दीदी  आपका  बहुत समय लिया हमने अब चलते हैं ." फिर आईयेगा आप लोग, अच्छा लगता है मिल कर " हाँ हाँ क्यों नहीं जरुर आयेंगे .नमस्ते नमस्ते कहकर सब चली गयी .
       जूठे बर्तनों को उठाते हुए सुखिया बोली " अरे बापरे ये सब तो जासूसी करने आई थीं  " तो तू क्या अपने को ही तीसमारखां समझती है ?मैंने हंस कर कहा .पर मेरे दिमाग में भी इक्च्छा  हो रही थी जाननेकी की क्या हुआ था रात में . एकाएक बगल से जोर जोर से मालती के बोलने की आवाज आयी .  अब मुझसे भी रहा न गया चाहे जो हो पडोसी धर्म भी तो कोई चीज होती है मै पैरों में चप्पल डाला और  जल्दी से निकल पड़ी अपना धर्म निभाने  . वहां जा कर जो देखा तो सकते में आ गयी  मालती घर के सामानों को पागलों की तरह उठा कर फेंके जारही थी साथ ही गुस्से में बोले जा रही थी "किसी के नजर में अब मेरी  इस घर में कोई कदर ही  नहीं रह गयी है .सालोंसाल मैनें इस घर को दिया पर यहाँ मेरी तो कोई औकात ही नहीं है सब अपने  मर्जी के मालिक हैं  .अब मुझसे नहीं रहा गया थोडा डांटने वाले अंदाज में कहा "  ये क्या बचपना है मालती ? मेरी और देख कर वो लपक कर आयी " सरला तू बता मै जो कर रही हूँ  कुछ गलत कर रही हूँ क्या ? "मुझे कुछ बताएगी तब तो पहले तो तू ये सब बंद कर, अभी भी उसके हाथो में एक बड़ा सा प्लेट था वो झेंप कर उसे टेबल पे रख दी ..उसके घर का माहौल एकदम तनाव पूर्ण लग रहा था .मैंने नंदिता को आवाज लगाई तो मालती ने विरोध करना चाहा आँखों से उसे चुप रहने का इशारा किया मैंने . "जी चाची , "बेटा जरा इलायींची वाली चाय गर्मागर्म पिला तो बेटा  "अभी लाई चाचीजी .नंदनी जब चली गयी तब मैंने मालती को आड़े हांथो लिया " ये सब क्या था? "तुझे तो सब पता है क्या छुपाऊं ,मैंने नंदू के गर्भ का लिंग जाँच कराया है.  "क्या मैं चौंक गयी ऐसा ये दोनों चाहते थे क्या? "नहीं ये तो मेरी ही जिद थी ?  "देखो सरला जानते हुये भी अनजान न बनो. मालती थोडा नाराज होने लगी थी .मैंने खुद को संभाला." तीन पोतियों तक मैं चुप रही हालांकि माला मेरी इक्च्छा भली प्रकार से जानती थी फिर भी बिना बताये उसने ओपरेशन भी करा लिया .नंदू की भी पहली बेटी ही हुई ये लोग दो ही बच्चा चाहते हैं अब तू ही मुझे बता मैं कहाँ जा कर फरियाद करूँ की वंश चलाने के लिए कम से कम एक बेटा तो चाहिए ही.मै जानती थी मालती को समझाना बहुत ही मुश्किल है फिर भी एक कोशिश करना मुझे जरुरी लगा .चाय आगई थी " अबतो चलो पहले चाय पियो फिर बाते होंगी कह कर विराम लगाया मैंने .नंदनी पापाजी को चाय देने जा चुकी थी .जब हम दोनों की चाय ख़तम हो गयी तब बातों का सिलसिला फिर से शुरू किया " तू क्या सोचती है जो तू करना चाहती है वो सही है? " सही गलत मैं जानना नहीं चाहती पर एक पोते की चाह है मुझे बस  ".फिर इसे वंश की जरुरत है ऐसा क्यों कहती हो ? "वो तो है ही वरना हमारे वंश का तो नाम ही मिट जायेगा . "तू किस वंश का बोल रही है ?क्या तू मुझे एक भी नाम बता सकती है अपने या  पाण्डे जी के परदादा के पहले का, शायद उनका भी नाम तुझे नहीं मालुम होगा .मालती सकपका सी गयी  उसे सच में नहीं मालुम था .मैंने अपनी बात जारी रक्खी " पाण्डे जी भी नहीं जानते होंगे फिर ये ढोंग क्यों वंश के नाम का ?जब वंश वाले को ही नाम नहीं पता तो बाहर वाले को इससे क्या मतलब देख मालती चाहे तू मुझसे लाख गुस्सा हो फिर भी मैं कहूँगी की तू गलत है .एक बार फिर ठंढे दिमाग से सोच कर देख .अपनी चाहत के लिए नंदू के जीवन से खिलवाड़ कर रही है साथ ही पूरे घरके लोगों को नाराज .ऐसे में क्या तू सुखी रह पायेगी और तो और एक अजन्मे बच्ची के हत्या की  गुनहगार भी बन जाएगी .मालती के चेहरे के भाव से लगा मेरी बातों का कुछ कुछ  असर हो रहा है कुछ देर बैठ कर मैंने उसे ये भी कहा "मान ले तेरी जिद में अगर नंदू को कुछ हो गया तो गौरव तुझे कभी भी माफ करेगा ? पाण्डे जी या सोना की छोड़ क्या तू अपने आप से कभी नजरें मिला पायेगी थोड़ी देर बाद उसे अकेला छोड़ देना मुनासिब समझ कर मैंने कहा  ." मैं अब चलती हूँ पर तू जरुर इस बात  पर  गौर करना .मैंने मालती के दिल और दिमाग दोनों में खलबली मचा दी थी अब वो भी बिना सोचे कोई कदम नहीं उठाएगी इसका मुझे पूरा यकीन था .और सच में  उस दिन से मालती का चैन खो गया वह परेशान सी रहने लगी .घर वालों ने भी थोडा चैन की साँस ली की इसके सर से पोते का भूत शायद दूर हो गया .रात को मालती करवटें बदल बदल कर थक गयी तब उसने बीते दिनों की सारी घटनाओं पर गौर से सोचा तब कहीं उसे लगा सिर्फ वो परेशान नहीं है पूरे घर वालों का चैन उसकी वजह से ख़तम हो गया है धीरे धीरे उसे अपने किये का अहसास होने लगा .पाण्डे जी ने लगभग बात करना ही छोड़ दिया था आजकल गौरव भी उनसे दूर भागने का मौका ढूंढता फिरता है.और नंदनी, उसके तो  चेहरे की हमेशा रहने वाली मुस्कान ही गायब हो गयी हो जैसे बिलकुल बेरौनक मुरझाई मुरझाई सी हो गयी है .मालती को अपनी भूल का अहसास हो रहा था  बेचारी नंदू का क्या कसूर है उसने तो उनके गलत बातों का भी कभी खुल कर विरोध नहीं किया ये और बात है हर बार वो प्यारी बच्ची अपने में ही कहीं खो सी गयी .अब न तो पहले जैसा हंसती खिलखिलाती है न ही लाड से उनके गले में बाहें डाल प्यार मनुहार जताती है और तो और अब उसने गौरव का शिकायत करना भी बंद कर दिया है इन सारी बातों पर तो उन्होंने इधर गौर तक नहीं किया था. .इन दिनों तो जैसे उनको पोते के सिवा कुछ और दिखाई तक देना बंद हो गया था " .नहीं नहीं मैं सब के साथ बड़ी नाइंसाफी कर रही हूँ .पर   मेरा पोता , क्या मेरी चाहत वो कभी भी पूरा नहीं होगा? मालती बेचैनी में करवटें बदलते बदलते बहुत मुश्किल से तीन बजे भोर में जाकर कहीं सो पायी पर नींद में भी उसे चैन नहीं था उसे एक अजीब सा सपना आया और वो घबरा कर उठ गयी .थोड़ी देर तक वो बैठी रही फिर मेरे घर आगई . "इतना सवेरे सवेरे तू ? मै तो हमेशा से ही सुबह पांच बजे ही उठ जाया करती हूँ पर मालती तो सात बजे भी मुश्किल से चाय के लिए  उठाने पर नखरे के बाद ही उठती है. आज इसे क्या हुआ ? " आजा अन्दर चल कर चाय पीते हुए बात करेंगे .अन्दर जा कर मैं गौर से मालती का चेहरा देखने लगी मुझे लगा वो बहुत ही बेचैन थी .कुछ कहना चाहती थी पर शब्द नहीं मिल रहा हो जैसे फिर धीरे धीरे उसने कहना शुरू किया" सरला मैंने एक सपना देखा है  "अच्छा क्या देखा सपने में? "तू यकीन करेगी " हाँ हाँ तू बता तो सही ?  "तेरे जाने के बाद मै परेशान थी कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कभी लगता मैं सही हूँ आखिर जिस कुल देवी की हम पूजा करते आयें हैं हमारे बच्चों के बाद क्या वो बंद हो जाएगा ?कभी लगता तू सही कह रही है मैं आपने घरवालों के साथ खासकर नंदनी के साथ जबरदस्ती कर रही हूँ .रात इसी कशमकश में बड़ी मुश्किल से नींद आयी और उसके बाद बड़ा ही विचित्र सपना देखा ,सपने में एक प्यारी सी बच्ची मेरा हाथ पकडके पूछ रही थी " दादी मैंने क्या किया है जो आप मुझे अपने पास आने से रोक रहीं हैं ?प्लीज दादी मुझे मत मारो मुझे इस दुनिया में आने दो मुझे जीने दो .फिर जो मेरी नींद खुली तब से मै अजीब सी बेचैनी  में डूब गयी हूँ .मै क्या करूँ सरला अपने इस अजीब सी उलझन का ?उसके हाथों को धीरे से दबा कर तस्सली दी फिर मैंने कहा " तू अपने आप को भगवान कब से समझने लगी है मालती कुछ न सझने पर मेरी तरफ प्रश्न सूचक नजरों से  ताक रही थी . "  देख जीवन मरण ये सब ऊपर वाले की मर्जी से होता है ये तो मानती है न तू " हाँ ये भी कोई बताने वाली बात है क्या ? सभी जानते और मानते हैं इस बात को " फिर तू क्यों भगवान के काम में दखल देने का प्रयास कर रही है, " .क्या मतलब? " देख तेरे कुल देवी की मर्जी है की नंदनी की बेटी हो ,और तू चाहती है की बेटा हो
   ऊपर वाले की न चल कर तेरी चले तो सारी गड़बड़ी तेरी फैलाई हुई है .सब लोग तेरी वजह से परेशान हैं और क्या पता की तेरी   पोतियाँ बड़ी होकर तेरे कुल का नाम इतना रौशन करें जो किसी का बेटा भी न कर सके .तू भी तो जानती है गाँधी जी के बेटे को कितने लोग जानते हैं ?और जवाहरलाल की बेटी को, सारी दुनिया जानती है.  "मैंने कभी इस तरह सोचा ही  नहीं है सरला सच में मुझे अपनी गलतियाँ नजर आने लगी है पता नहीं क्यों मैं ये मौक़ा हाथ से जाने नहीं देना चाहती थी हर हाल में  एक पोते की मुझे जिद चढ़ गयी थी पर अब लगता है तू ठीक ही कह रही है..मैं अपनी गलतियों को सुधारना चाहती  हूँ. आज ही सबसे माफी मांग लूंगी  ख़ास कर नंदू से ,क्योंकि सबसे अधिक उसे ही दुःख दिया है  .मुझे प्रायश्चित भी तो करना है.  ".अब तुम बिलकुल सही दिशा में  सोच रही हो देखना सब कुछ अच्छा होगा .मालती ने कैसे माफी माँगा और क्या किया ये जान कर क्या होगा बस इतना जान लेना मेरे लिए काफी था की उसके घर में फिर से हंसने  खिलखिलाने की आवाजें आने लगी थीं .एक दिन मालती ने खाने पर बुलाया खाना हो गया आइसक्रीम हाथों में लेकर सब बैठक में आगये  तब मालती " बोली सरला कुछ दिनों के लिए मै पुणे जाना चाहती हूँ क्योंकि  इस हालत में नंदू का अकेले जाना और घर बार ठीक करना उचित नहीं होगा .सहायता के लिए लोग होंगे पर मेरा मन नहीं मानता है तू क्या कहती है ?  "और पांडेजी का क्या होगा ? " तू तो  है न .मालती ने हंस कर कहा ये भी बाद में आजायेंगे पर अभी तो इनका जाना मुश्किल है वहाँ घर ठीक करके जब हम फ्री होंगे तबतक ये भी आजायेंगे पर अभी तो कुछ दिनों तक तुझे  इनका ख्याल रखना है .पाण्डे जी बोले भाभी इसका मतलब है नजर रखना है  .इस बात पर सबलोग हंस पड़े . कितने दिनों बाद नंदू ओर गौरव को साथसाथ हंसता देख मन तृप्त  हो गया . सोना सबको हंसते देख खिलखिला पड़ी .मौसम कितना सुहाना हो गया था .

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