आज मैं कुछ दिनों पहले ही मेरे जीवन में घटी बातों को याद कर रही हूँ ऐसा लगता है जैसे कोई सपना था .अपने इस सपने के पूरे होने पर खुश भी हो रही हूँ .पर मेरी ये खुशी मुझे किस तरह से मिली ?ये आप भी जान लीजिए .
मैं अपने माँ बाप की इकलौती औलाद हूँ .मुझसे पहले मेरे तीन भाईयों का जन्म हुआ था पर वे कुछ ही दिनों के मेहमान बन के आये थे.सो मैं ही उनकी आखरी उम्मीद के रूप में जिन्दा बच गयी थी .मेरे बाद फिर कोई और पैदा नहीं हुआ था .इस लिए मुझे काफी नाजों से पाला गया था मेरी हर ख्वाहिश को पूरा किया जाता था .शायद इस वजह से मैं थोड़ी जिद्दी भी हो गयी थी .पर सब मुझे अच्छी बच्ची ही कहते थे .
पापा को गुजरे काफी साल हो गए तब मैं आठ साल की थी जब उनका एक एक्सीडेंट से मौत हो गया था . मम्मी तो उस सदमे से पत्थर हो गयी थी .सालों लगा उन्हें इस से उबरने में .तब नजमा आंटी ने ही हम दोनों को संभाला था .सिर्फ उसी समय क्या ?मेरा तो जनम ही उन्ही के हाथों हुआ था .
दरअसल मम्मी और नजमा आंटी का मायका एक ही गांव बेलापुर में है .आंटी मेरी छोटी मौसी यानि रानी मौसी की सहेली थी दोनों स्कूल से लेकर मेडिकल तक की पढ़ाई साथ साथ ही की थीं .मम्मी की शादी मौसी और आंटी के मेडिकल पास होने के पहले ही हो गया था.रानी मौसी और नजमा आंटी का साथ मेडिकल की पढ़ाई तक रहा था बाद में दोनों की शादी हो गयी .मौसी अपने डाक्टर पति के साथ लन्दन जा कर सेटल हो गयी नजमा आंटी अपने एडवोकेट पति मुहम्मद अल्ताफ हुसैन के साथ इसी शहर लखनऊ जहाँ उनका ससुराल भी है आ कर अपना नर्सिंग होम खोल कर प्रैक्टिश करने लगीं .कभी रानी मौसी इण्डिया आतीं तब खूब मस्ती भरे दिन होते थे .बड़ा मजा आता हमें भी हम इन्तजार करते रहते थे उनके आने का
मेरे पापा भी इसी शहर के नामी डाक्टर थे डाक्टर सूर्य प्रताप सिंह .संजोग से इनलोगों का घर भी आस पास ही था सो दोनों परिवार में काफी दोस्ताना रिश्ता था .मम्मी अपने तीन तीन बच्चे खो कर एकदम ही निराश हो गयीं थी .जब उन्हें फिर से लगा की वे उम्मीद से हैं तो खुश होने के बजाये वो घबराहट से परेशान हो कर नजमा आंटी के पास जा कर रो पड़ीं.” अब और मैं नहीं बर्दास्त कर पाऊँगी.एक बार फिर उसी उम्मीद और ना उम्मीदी के चिंता का बोझ अब नहीं उठा सकती हूँ ,प्लीज नजमा तुम कुछ करो .” ” शोभा दी आप यहाँ बैठ जाइये पहले ,"उन्होंने एक गिलास पानी मम्मी के हाथ में पकडाया "अब इसे पी लें आप फिर बात करतें हैं .” थोड़ी देर बाद जब माँ शांत हो गयी तब आंटी ने माँ को समझाया "दीदी अभी तक आपके साथ जो भी हुआ वो अच्छा नही हुआ . पर इंसान इस तरह हार कर तो नहीं बैठ जायेगा .अब आप सब मुझ पर छोड़ दें मैं खुद अब अपनी निगरानी में आपको ले रही हूँ .अब से आप अच्छी अच्छी किताबें पढ़ें गाने सुने और हाँ नसीम को तो अपनी आंटी से बड़ा प्यार है उसे भी अब आपका साथ मिला करेगा .पर हाँ आपका खाना पीना , दवा और आराम ये सब मेरे मर्जी से अब होगा .मम्मी को भी ये सही लगा .फिर तो पूरे समय मम्मी उनके देख रेख में उन्ही के नर्सिंग होम में रहीं .
नसीम इस बीच माँ से बहुत हिलमिल गया था .ये लगाव आज भी जारी है अपनी माँ के जितना ही प्यार करता है वो मेरी माँ से .उस वक्त वो करीब चार साल का था .माँ का भी सारा समय अच्छा से पूरा हुआ सही टाइम पर मेरा जन्म
हुआ और ईश्वर की कृपा कहें या आंटी की सही देख भाल इस बार माँ की गोद हरी भरी हो गयी .इस तरह से मेरा और नसीम दोनों का बचपन दो दो माओं के ममता भरी छावं में पला बढा है .
समय के साथ हम बड़े होते गए .धीरे धीरे मुझमें एक बदलाव आ रहा था .अब मै पहले की तरह नसीम से
बात नहीं कर पाती थी एक झिझक सी होने लगी थी .नसीम को भी पहले जैसा मेरी पीठ पे धौल ज़माना चोटी खींचना ये सब करने में अब संकोच होने लगा था .पर एक बात साफ था ,हम दोनों को मन ही मन में एक दूसरे के लिए कुछ अजीब सा एहसास होने लगा था जिसे हम दोनो की माताओ ने पढ़ लिया था .फिर तो हम दोनों को अच्छे से समझा दिया गया की दोस्ती होना एक बात है पर उससे ज्यादा की सोचना भी नहीं क्योंकि हमारा मजहब और समाज बिलकुल अलग है . इससे आगे अपने कदम बढाने की जुर्रत भी नहीं करना .हमने भी अपने मन को समझा लिया था .और पूरी तरह से अपने मर्यादा में रहने लगे थे .मिलना जुलना भी अब कम हो गया था .पर मन का कोई कोना अब भी एक दूसरे के लिए धडकता था .
माँ को मेरी शादी की चिंता होने लगी थी.उन्होंने अपनी तरफ काफी कोशिश भी शुरु कर दिया था पर पापा के नहीं होने से बहुत सारी दिक्कतें आ रही थी .अपना कहने को तो कुछ रिश्तेदार थे पर सब के सब दुश्मन से भी बढ़ कर थे .एक हमारे चाचा जी थे जो माँ से कहते की आपको बेटा है नहीं तो पहले अपनी सारी जायदाद मेरे या मेरे बेटे के नाम पर कर दीजिए क्योंकि असूलन ये हमारा ही है .आपका तो कोई वारिस ही नहीं है एक बेटी है जो शादी कर के अपने घर चली जायेगी .आप ये सब अपने साथ ऊपर तो लेके नहीं जाएँगी?वैसे भी ये सब कुछ मेरे भाई का है उनके बाद अब मेरी मल्कियत है. जब आप ये हमारे नाम लिख देंगी उसके बाद ही हम रूपा की शादी करेंगे .
पापा ने बहुत पहले अपने भाई को पहचान लिया था इसीसे उन्होंने अपनी सारी संपत्ति घर जमीन खेत सब माँ के नाम उनके बाद मेरे नाम होने का वसीयत कर चुके थे पापा के मौत के बाद .जब चाचा को पता चला था तब बहुत बड़ा हंगामा खड़ा किया था. उन्होंने हमें धमकी भी दिया था .वो तो अल्ताफ अंकल की वजह से हमे कोई नुक्सान नहीं पहुंचा पाए थे .उसी का बदला अब लेने की कोशिश में जुटे थे .नानी के यहाँ भी कुछ कुछ ऐसा ही नजारा था .बड़े मामा जी को गुजरे एक अरसा हो चूका था .छोटे मामा तो बहुत पहले ही विदेश में जाकर बस गए .पहले कभी कभी आते भी थे .नाना नानी के मरने के बाद भी आये थे. पर जबसे दिलीप भैया ने उन्हें सारा कुछ उनके नाम करने को बोला तभी से उनमे झगडा शुरु हो गया ,छोटे मामा अपने हिस्से की सारी जायदाद बेच कर वापस चले गए अब तो कोई फोन भी नहीं आता है. मम्मी के मायके में बस दिलीप भैया ही है जो की एक नंबर का बदमाश है . दिलीप भईया की नजर भी हमारे जायदाद पर लगी है .
माँ ने मेरी शादी की बात दो तीन जगह चलायी भी तो मेरे चाचा और भाई ने बात बनने के पहले ही बिगाड़कर रख दिया ..कहीं पर बात बनती नजर आती तो हमे ही लोग लालची और मक्कार लगते .इन दो सालों में माँ बिलकुल टूट सी गयी थी .इस बीच एक बार नसीम ने कहा भी "अगर आंटी को मंजूर हो हमारा रिश्ता तो सारा किस्सा ही खतम जाए हमें भी मन मांगी मुराद मिल जाये .” पर मैंने ही उसे रोका था ."ऐसा गजब भूल कर भी मत करना वरना माँ जाने क्या समझ बैठेंगी.” असल में माँ बहुत स्वाभिमानी औरत हैं उनके स्वाभिमान को जरा भी धक्का लगेगा तो पता नहीं क्या कर बैठें इतने सालों की दोस्ती का कोई बुरा हश्र हो ये मैं नहीं चाहती थी .
किसी तरह पापा के एक दोस्त तैयार हुए अपने बेटे से रिश्ता करने के लिए .पर पहले से ही उन्होंने ये जता दिया था की वे सिर्फ अपने मरहूम दोस्त के खातिर ये रिश्ता मंजूर कर रहे हैं .पर असलियत क्या था वो सब जानते थे .एक तो उनका बेटा कुछ करता धरता नहीं था .पढ़ाई भी कुछ खास नहीं किया था .माँ से वे पहले ही तै करवा लिए थे की उनके बेटे को माँ कोई बिजनेस शुरु करवा देंगी .यानि एक तीर से दो शिकार ,एहसान भी जता रहें थे और अपने नालायक बेटे का भविष्य भी बना रहे थे .मेरा दिल जार जार रोता था . पर ऊपर से मै खुश होने का नाटक करती थी.जिससे माँ को दुःख न पहुंचे .नसीम अब मेरे सामने जल्दी नहीं आता था .मै भी उससे दूर ही रहती थी .
शादी के दिन बारात आ चुकी थी .नजदीक का तो कोई था नहीं बस रानी मौसी और मौसा
,साथ में उनका बेटा समीर और बेटी निशा भी थे इनके अलावा भी माँ के दूर के कुछ रिश्तेदार और पापा के तरफ के कुछ लोग भी थे .इन सब के साथ अल्ताफ अंकल और आंटी भी शादी के तैयारियों में लगे हुए थे . बारात के निकलने का समय हो रहा था .मुझे दुल्हन के रूप में सजाया जा रहा था .कुछ रस्मे भी निभायी जा रही थी .आखिर कार दरवाजे पर हल्ला मच गया बारात आगई चलो लड़के को देखें .सब के सब बाहर की तरफ दौड़े बारात देखने के लिए .कुछ देर में नेगचार हुआ ,बारातियों का स्वागत सत्कार हुआ फिर वे जनवासे में आराम करने चले गए .शादी की तैयारी शुरु की गयी .पर लड़का या उसके घर वालों का कोई पता ही नहीं था .पता किया गया तो मालुम हुआ वे जनवासे में ही बैठे हैं .माँ का दिल धड़क उठा "पता नहीं कहीं फिर से चन्द्र प्रताप ने या दिलीप ने कुछ गडबड तो नहीं किया है ?” सब माँ को दिलासा देने लगे "अरे शुभ शुभ बोलो सब कुछ अच्छा होगा बाराती तो कुछ नखरे दिखाते ही हैं .”पर मेरा दिल भी आशंकित हो गया था .मौसा जी और अल्ताफ अंकल काफी देर बाद जनवासे से लौटे पर उन्हें देख कर लगा कुछ हादसा हो गया था .माँ से उन्होंने कुछ देर तक बात की पर कुछ नतीजा नहीं निकला .लड़के के पिता को बुला कर माँ ने बात की पर उन्होंने सिर्फ ये कहा जानते बूझते मै मक्खी नहीं निगल सकता हूँ ये शादी अब किसी भी कीमत पर नहीं हो सकता है .बारात वापस जायेगी .माँ के लाख समझाने का गिडगिडाने का उन पर कोई असर नहीं हुआ वे चले गए .
. घर में कुहराम मच गया.काफी देर तक माँ बुत बनी बैठी रही .सब के चेहरे पर मायूसी छा गयी थी .पर मै न जाने क्यों एक खुशी का अनुभव कर रही थी .सब कहने लगे" मंडप पर बैठी दुल्हन को अब कौन ब्याहेगा .बेचारी के साथ बहुत ही बुरा हुआ ."कुछ फुसफुसा कर बातें कर रहे थे " सगे चाचा, मामा का किया धरा है सब उन्होंने ही लड़के और उसके पिता को बताया है की लड़की का चालचलन खराब है .”
अचानक माँ नजमा आंटी और अल्ताफ अंकल को बुला कर बोली "जो हुआ सो आप को पता है ,क्या आप अब भी मेरी बेटी को अपनी बहू के रूप में स्वीकार कर सकते है " अंकल बोले "मैं तो शुरु से ही चाहता था भाभी हमे तो ये रिश्ता मंजूर था पर आपकी वजह से कभी जबान पर नहीं ला सके आप बिरादरी वालों के खातिर मंजूर नहींकर पातीं." माँ बोली "हाँ आप सही कह रहे हैं पर आज मेरी आँखों से बिरादरी का पट्टी उठ गया है .” “ हाँ भाभी सबसे बड़ा धर्म इंसानियत का ही मानना चाहिए . आंटी तो खुशी से मुझे गले से लगा लिया .पर घर में जमा मेहमानों ने अपनी नाराजगी जाहिर करना शुरु कर दिया .पर इस बार माँ अपने निर्णय पर अडिग थीं .."मैं अपनी बेटी को एक नेक इंसान के परिवार में दे रही हूँ .जाती या बिरादरी वाले इसे मंजूर करें या नहीं करें मैं अपना फैसला नहीं बदलूंगी .आप अगर मेरी बेटी को अपना आशीर्वाद देंगे तो मुझे खुशी होगी .अब आपको इस शादी में शामिल होना है या नहीं ये फैसला आपका होगा .
अल्ताफ अंकल ने ये भी साफ कर दिया " मैं आप सब को बताना चाहता हूँ इस शादी में किसी को भी लड़का या लड़की को धर्म बदलने की कोई जरुरत नहीं है.शादी सभी धर्मों के हिसाब से होगी बाद में कोर्ट मैरेज भी होगा .”
.शहर भर में एक मिसाल बन गया था हमारी शादी का होना .हाँ कुछ सिरफिरे लोगों ने जिनमे दोनों मजहबों के लोग शामिल थे हमारी शादी का बहिस्कार भी किया नारे भी लगाये पर पुलिस के इंतजाम के बीच खुशी खुशी शादी हो गयी .लोगों ने इसे मंजूर भी कर लिया .हम सब खुश हैं मेरी माँ भी .
अचानक मेरी सोच को लगाम लग गया " किन ख्यालों में डूबी है मेरी दुल्हन "नसीम ने मुझे छेड़ते हुए कहा "दस बजे की फ्लाईट है, सारी तैयारी हो गयी हो तो चलो मम्मी से मिल आयें .नीचे अब्बू अम्मी हमारा इन्तजार कर रहे हैं .
हम आज रात को अपने हनीमून पर सिंगापुर जा रहे हैं .
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